पारा शिक्षकों का तारणहार कौन?

मनीष : झारखंड के स्थापना दिवस के दिन यहां के पारा शिक्षकों के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद घमासान मचा हुआ है। ऐसे में यह कहना कठिन है कि उनके हितों की कितनी रक्षा होगी लेकिन हर राजनैतिक दल उनका हितैषी बनने की कोशिश कर रहा है। जहां रघुवर सरकार इन पारा शिक्षकों को गुंडा तत्व बताते हुए कठोर कदम उठाने पर तुली है वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे अलग रंग देते हुए इसे बाहरी- भीतरी का मामला बना दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री सोरेन ने सरकार द्वारा लागू की गई स्थानीय नीति को धोखा बताते हुए बताते हुए कहा है कि रघुवर सरकार का एक सूत्री कार्यक्रम है कि किसी तरह राज्य में बाहरी लोगों को स्थापित किया जाए ताकि वोट बैंक बढ़ता रहे। इसीलिए एक षड्यंत्र के तहत इन पारा शिक्षकों को बर्खास्त कर जेल भेजने की कार्रवाई की जा रही है और उनपर केस मुकदमा लादा जा रहा है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि पारा शिक्षक यहां के आदिवासी और मूल लोग हैं।

दूसरी तरफ स्थापना दिवस के पूर्व ही एक साक्षात्कार में मुख्यमंत्री रघुवर दास कह चुके हैं कि झामुमो ने ही आदिवासियों का सर्वाधिक शोषण किया है। हेमंत सोरेन जब सभा में आये तो उन्होंने स्थानीयता को भी परिभाषित नहीं किया। झामुमो ने आदिवासी ही नहीं युवाओं को भी ठगा है।
एक तरफ सोरेन ने कहा है कि पारा शिक्षक अपना संघर्ष जारी रखें। झामुमो की सरकार बनने पर पारा शिक्षकों पर लादे सभी केस मुकदमे समाप्त कर दिए जाएंगे। वहीं झारखंड की शिक्षा मंत्री डाॅ0 नीरा यादव ने कहा है कि 15 नवंबर को राज्य का उत्सव था। उस दिन पारा शिक्षकों ने जिस प्रकार विरोध किया और पत्थरबाजी की, वह उचित नहीं था। 2015 से पारा शिक्षकों को सरकार ने कई सुविधाएं दी है।

पारा शिक्षकों को लेकर हो रहे इस घमासान के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने कहा है कि पलामू में जिस तरह से सीएम ने बयान दिया है वह एक तरीके से चैराहे की भाषा थी। अपना विरोध दर्ज कराने पहुंचे पारा शिक्षकों की पिटाई की गई। यह बर्दाश्त करने लायक बात नहीं है। वहीं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता प्रवीण प्रभाकर ने कहा कि कांग्रेस और झामुमो सीएम रघुवर दास से डर गया है। तमाम विपक्षी दल विकास बाधित करने के लिए पारा शिक्षकों को राजनैतिक मोहरा बना रहे हैं। पारा शिक्षकों के विरुद्ध लाठी चार्ज को निंदनीय बताते हुए आजसु के केंद्रीय महासचिव लंबोदर महतो ने भी कहा कि इस टकराव से बच्चों की शिक्षा बाधित हो रही है। झामुमो के महासचिव विनोद पांडेय ने कहा कि सरकार का रवैया अलोकतांत्रिक है। पारा शिक्षकों पर लाठियां बरसाई गई और मामला उजागर न हो इसे देखते हुए मीडियाकर्मियों पर भी हमला किया गया। झाविमो के प्रधान सचिव प्रदीप यादव ने इसे सरकार का तानाशाही रवैया बताते हुए कहा कि सरकार इन पारा शिक्षकों के साथ अपराधी की तरह व्यवहार कर रही है। राज्य में शिक्षा का दायित्व संभाल रहे पारा शिक्षकों के खिलाफ अमर्यादित शब्दों का प्रयोग सरकार की गंदी मानसिकता को प्रदर्शित करता है।

इन बयानबाजियों के बीच अब देखना है कि कौन सही तारणहार साबित होगा इन पारा शिक्षकों का? या कि इन राजनीतिक दलीलों के बीच कानूनी पेंचों की भेंट चढ़ जाएंगे ये शिक्ष्क। इन पारा शिक्षकों के स्थायीकरण की संभावनायें तलाशने में सरकार को थोड़ी और देर जरूर लगे लेकिन ऐसा न हो कि नई पीढ़ी का भविष्य बनाने वाले इन शिक्षकों का ही भविष्य खराब हो जाए।

राजनीति अपनी जगह ठीक है किंतु हर बात पर राजनीति कोई अच्छी बात नहीं है। चाहे जो भी कोई इन शिक्षकों के साथ राजनीति का यह गंदा खेल खेल रहा हो और ऐसी खौफनाक घटनाओं को अंजाम दे रहा है, इस पर रोक लगनी ही चाहिए। विडंबना देखिए कि शिक्षकों की समस्याओं का ही निराकरण नहीं हो रहा है तो शिक्षा की समस्याओं का क्या होगा और झारखंड के गरीब बच्चों के भविष्य का क्या होगा?

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