झारखंड में कितने पत्रकार

अभी हाल में सूचना जनसंपर्क विभाग के सचिव सह मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डाॅ. सुनील कुमार वर्णवाल ने सूचना भवन में एक बैठक में कहा कि राज्य के मीडिया कर्मियों को सरकार स्वास्थ्य बीमा योजना से जोड़ेगी। मीडिया कर्मी और उनके परिवार को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा। आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य बीमा के तर्ज पर ही मीडिया कर्मियों को भी स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाएगा। इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि अधिक से अधिक मीडिया कर्मी को इसका लाभ मिल सके। इसके कार्यान्वयन के लिए गठित समिति की बैठक में कई सुझाव प्राप्त हुए हैं इन सुझावों पर भी समग्रता से विचार कर जल्द ही सूचना एवं जनसंपर्क विभाग इसे कार्यान्वित करेगी। प्रधान सचिव ने कहा कि अत्यंत दुष्कर परिस्थितियों में भी मीडिया रिपोर्टिंग का कार्य करना तथा राज्य हित में जनहित में खबरों का प्रसारण करना मीडिया की चुनौती रही है। इनके स्वास्थ्य बीमा से इन्हें भी इलाज के लिए सुविधा मिलेगी।

मनुष्य है तो ईलाज की सुविधा मिलनी ही चाहिए, यहां तक तो ठीक है। पर क्या पत्रकार का टैग खुद बांध लेने वाले सभी को पत्रकार की संज्ञा देने जा रही है ये सरकार? बिना किसी निबंधित मीडिया हाउस से जुड़े और अस्पष्ट न्यूज पोर्टलों और यू-ट्युब चैनलों के स्वयंभू पत्रकारों को भी ‘पत्रकार’ के रूप में तरजीह देना कहां तक उचित होगा?

यहां उन मीडिया हाउसों की बात नहीं हो रही जो किसी निबंधित प्रिंट मीडिया या चैनल के हवाले से न्यूज पोर्टल और यू-ट्युब चैनल चलाते हैं। यहां तो उनकी तलाश है जो समाज में पत्रकार बन कर अपनी रंगदारी छटा बिखेरते फिरते हैं और तगादा-पत्रकारिता से अपनी रोजी -रोटी का समाज से दोहन करते हैं। छोटी-छोटी बातों पर समाज के संभ्रातों को भी घमका कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। उस पर से सरकार अगर ऐसों को पत्रकाररूप में बीमित और सुरक्षित करती है तो जरूर सोचनीय है।

झारखंड राज्य के जिलों के सूचना अधिकारीयों की लापरवारवाही बड़ा कारण बनती है ऐसों का धंधा चलाने में। जिला सूचना कार्यालयों में इन्हें जिला के मीडिया मेल लिस्ट में आसानी से जगह मिल जाती है और फिर ये जिला मीडिया लिस्ट में अपना नाम दर्शाकर बड़े आराम से समाज का दोहन करते हैं, जो सर्वथा अनुचित है।

झारखंड सरकार को समझना होगा कि शुद्ध पत्रकार ही जिम्मेदारी के साथ उनकी जनता का सही आईना बन सकते हैं, गैर जिम्मेवार तो कतई नहीं। सरकार अगर ऐसे तगादा-पत्रकारों और घमकी-पत्रकारों को निबंधित पत्रकारों की श्रेणी से छांट सके तो संभावना बनती है कि झारखंड की सामूहिक पत्रकारिता में और धार आए तथा सरकार को शुद्ध पत्रकारों से ही पाला पड़े।

सरकारी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों में भी इस मामले में एक जागरूकता की आवश्यकता दिख पड़ती है। साथ ही संभवतः भूलवश हो गई इनकी गलतियों को उकेर दिये जाने का भय इन्हें ऐसों को तरजीह देने को मजबूर करता हो पर जागरूक तो होना ही पड़ेगा। वर्ना समाज में पत्रकारों के प्रति मानसिकता में पूर्ण विकृति आने में देर नहीं लगेगी और इनका दैनिक, साप्ताहिक और मासिक दोहन चलता रहेगा।

सरकारी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को इस बात की पहचान होनी चाहिए कि अगर कोई तथाकथित पत्रकार इनके पास 4-5 मीडिया बैनर लेकर प्रस्तुत होता है तो वह किसी भी मीडिया हाउस का नहीं और ना ही कोई स्वतंत्र पत्रकार है। फिर उससे डर किस बात का?

न्युज पोर्टल या विडियो न्युज चैनल अगर किसी निबंधित मीडिया हाउस के अंग नहीं तो वो अमान्य होने चाहिएं। दूरदराज के किसी प्रिंट मीडिया या चैनल का प्रसार झारखंड राज्य में नहीं तो अमान्य, आदि आदि। ऐसे कुछ पैमानों पर अगर आकलन हो तो निश्चित तौर पर यह पता करना संभव हो सकता कि दरअसल झारखंड में कितने पत्रकार हैं और अगर सरकार को उन्हें किसी प्रकार की सुविधा देनी भी हो तो किन्हें देनी है। साथ ही जिला स्तर पर भी इनकी छंटनी का प्रावधान अमल में जल्द आना चाहिए ताकि समाज के कई अंग इनके धौंस कार्यक्रम से यथाशीघ्र निजात पा सकें।

कुल मिला कर अगर सरकार का भावी बीमाकरण कार्यक्रम अगर इन्हें भी इनलिस्ट करती हैं तो यह माना जाना चाहिए कि सरकार इन्हें भी किसी न किसी रूप में मान्यताप्राप्त पत्रकार का तमगा प्रदान कर दे रही है।

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