क्या मुकेश बोकारो का आखिरी रसूखदार घूसखोर है?

पूर्णेन्दु पुष्पेश:
केन्द्र से लेकर राज्य तक चाहे जिसकी भी सरकार आ जाए, भ्रष्टाचार खत्म करने के चाहे जितने दावे हों, लेकिन बिचैलिए ना तो किसी से डरे हैं और ना तो किसी से शायद डरेंगे। इन बिचैलियों ने हमेशा से सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। अभी ताजा मामला बोकारो के आपूत्ति विभाग के नाजीर मुकेश कुमार का है जिसे एसीबी ;भ्रष्टाचार निरोधक इकाईद्ध की टीम ने 71 हजार रूपये घूस लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा है। संभव है यह बहुत बड़ा मामला नहीं हो। इस नाजीर ने इससे भी बड़ी-बड़ी करतूतों को अंजाम दिया हो और अलग-अलग चरणों में इसके और भी भागीदार रहे हों।

मुकेश के बारे में बताया जाता है कि उसके पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर उसे 2010 में स्वास्थ्य विभाग में नौकरी मिली थी लेकिन जुगाड़ प्रवृति के बल पर वह उपायुक्त कार्यालय और फिर इसके गोपनीय शाखा तक पहुंच गया। फिर उपायुक्त तो आते-जाते रहे लेकिन इस मुकेश को वहां स्थाई होने का लाभ मिलता रहा। स्वास्थ्य सचिव ने जब पूर्व के उपायुक्तों को निर्देश दिया कि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों कि नियुक्ति दूसरे विभागों में नहीं हो सकती तो पहले तो उन आदेशों को तरजीह नहीं दी गई लेकिन बाद में आपूत्र्ति विभाग के नाजीर का पद खाली हुगा तो मुकेश ने नाजीर के रूप में अपनी पोस्टिंग वहां करा ली।

इस मुकेश की पहुंच कितनी लंबी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह जिस आवास में रहता है वह पूर्व में चास सीओ वंदना सेजवालकर के लिए आवंटित था और यही नहीं, मुकेश के खिलाफ आवास आवंटन में अनियमितता की शिकायतें राज्य मुख्यालय तक भी पहुंचीं पर कोई उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सका और वह एक उच्च सरकारी अधिकारी की तरह वहां मजे से रहता रहा।

गत दिनों भ्रष्टाचार निरोधक इकाई के हत्थे चढ़ जाने के बाद मुकेश के घर से 4.65 लाख रूपये नकद भी बरामद किए गए। जबकि उसके और उसकी पत्नी के खातों में लगभग 10 लाख रूपये होने के प्रमाण भी एसीबी को मिले हैं। गहने और निवेशों के कागजात भी बरामद हुए। एसीबी ने छापेमारी के बाद संबंधित संचिका भी जब्त कर ली। स्वास्थ्य विभाग की ओर से उसके निलंबन की कार्रवाई तो प्रारंभ हुई और चूंकि मुकेश की प्रतिनियुक्ति उपायुक्त के कार्यालय में भी थी, वहां से भी उसे निलंबन पत्र मिलना था।

एसीबी की सक्रियता से विगत चार वर्षों में 16 घूसखोर हाजत की हवा खा चुके हैं। इसे एक बड़ी सफलता के तौर पर ना सही मगर रेखांकित तो किया ही जा सकता है। उल्लेखनीय है कि इसमें 2015 में बेरमो, चास और कसमार के राज्स्व कर्मचारी पकड़े गए जबकि हरला थाना के एएसआई भी इसकी चपेट में आ गए थे। 2016 में बेरमो प्रखंड के पंचायत सेवक और बालीडीह गोपी के दारोगा घूस लेते पकड़े गए थे। वहीं 2017 घूसखोरों के लिए सबसे खराब साल रहा। इस साल गोमिया के राजस्व कर्मचारी रवीन्द्र नाथ पात्रो 7000 रूपये घूस लेते पकड़े गए। जिला शिक्षा अधीक्षक परिक्षित साव मात्र तीन हजार के चक्कर में मारे गए। माडा के लेखा लिपिक शैलेन्द्र प्रसाद सिंह, नावाडीह प्रखंड के पंचायत सेवक फिराज अंसारी, नावाडीह प्रखंड के विकास पदाधिकारी अरूण उरांव और एसडीओ कार्यालय के पेशकार दिलीप साव भी घूसखोरी के चक्कर में फंस चुके हैं।

शायद अब ज्यादा चैकन्ने रहने के कारण 2018 में एसीबी को मात्र दो शिकार ही मिल पाए। एक तो मार्च में ही बेरमों प्रखंड के शिक्षा प्रसार अधिकारी महेन्द्र कुमार जो 40 हजार रूपये घूस के साथ पकड़े गए थे और अब वर्ष के लगभग अत में आपूत्र्ति विभाग के नाजीर मुकेश कुमार अब तक के सबसे ज्यादा घूस राशि 71 हजार रूपये के साथ गिरफ्तार हुए हैं।

वैसे तो ऐसे घूसखोरों के लिए एसीबी एक दहशत का नाम है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इससे ये गोरखधंधे बंद हो जाएंगे। अपादमस्तक लंबी चैनलों को एक बारगी समाप्त कर देना इतना आसान भी नहीं। लेकिन एक उम्मीद तो जगी है कि घूसखोरो की अब खैर नहीं। इस सबके बावजूद यह भी जरूरी है कि रिश्वत देने वाले भी कितने दोषी हैं। यह सच या बहाना तो चलेगा नहीं कि जबरन रिश्वत देनी पड़ती है। यह समझ भी विकसित हो कि देनदार कितना दोषी है। साथ ही यह डर भी पैदा हो कि रिश्वत लेने वाले तो पकड़े जाएंगे ही रिश्वत देने वाले भी बच नहीं पाएंगे। रिश्वत देने वालों के लिए यह सुविधा तो है कि इससे उनका काम निकल जाता है, मगर इस बहाने वे कैसी परंपरा को जन्म दे रहे हैं या किस परंपरा को पाल-पोष रहे हैं, इस पर भी गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए। नहीं तो लोगों पर उंगलियां उठाने की परंपरा का पालन करने वाले वहीं लोग जब अपना काम निकल आता है तो रिश्वत देने को तत्पर हो जाते हैं और स्वयं इस विकृत मानसिकता के शिकार हो जाते हैं।

इसलिए दूसरो को चोर- घूसखोर बताने वाले खुद ईमानदार हों, स्वयं पर पकड़ मजबूत करें तभी व्यवस्था बदल पाएगी वर्ना सब सिर्फ सिस्टम पर ही सवाल उठाते रहेंगे और वैसे लोग समाज को घुन की तरह खाते रहेंगे।

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