झारखंड हमारा बपौती राज्य है: हेमंत

बेख्याली में झारखंड के नेता हर वो सीमा पार करने को आतुर हैं जहां से उनके हिसाब से उनके मतलब की गुंजाईश दीख पड़ती है। पद की गरीमा का कोई ख्याल नहीं, कोई मलाल नहीं! ये भी नहीं कि झारखंड की जनता कितनी आहत होती है, कितनी शर्मीन्दा होती है!!

पूर्णेन्दु पुष्पेश :

‘‘झारखंड हमारा बपौती राज्य है। हम यहां के आदिवासी- मूलवासी हैं। हम धरती का एक हिस्सा हैं और हमसे ही कोई हिसाब मांगता है? सीएम को शर्म आनी चाहिए। मालिक से कोई हिसाब मांगता है!’’ -ये बातें पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास के जामा में दिए गए बयाद पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कही। सोरेन ने साथ यह भी कहा कि झामुमो का सामना करने के लिए सीएम के पास कोई मुद्दा ही नहीं है। वही घिसी-पिटी बातें करते रहते हैं।

उधर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि ने दुमका में फिर कहा है कि सोरेन परिवार ने आदिवासियों की सबसे ज्यादा जमीन हड़पी है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि गोला के रहने वाले झामुमो सुप्रिमों शिबू सोरेन ने एसपीटी एवं सीएनटी एक्ट का उल्लंघन कर दुमका, देवघर, रांची, साहिबगंज के पतना, धनबाद और बोकारो में जमीन हड़प ली है।

कहां तो लोगों को लग रहा था कि झारखंड तरक्की की राह पर है। बिजली या अन्य बहुतेरे जरूरी सुविधाओं में भले ही ढांचागत सुधार नहीं हुआ हो लेकिन सड़कों का चैड़ीकरण दिखने लगा था। लेकिन इस बीच आरोपों और प्रत्यारोपों का यह खेल शुरू हो गया है। दोनो तरफ से जुबानी जंग जारी है। और जारी है एक दूसरे पर आरोप मढ़ने का सिलसिला। दोनो ही स्वयं को झारखंडवासियों का हितैषी साबित करने की कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन किस कीमत पर? एक दूसरे पर लांछन लगा कर, एक दूसरे को यहां की जनता का दुश्मन बताकर! हेमंत सोरेन रघुवर दास को ‘बाहरियों’ का हितैषी बता रहे हैं तो रघुवर दास यह बात बार-बार कहने से नहीं चूक रहे हैं कि आदिवासियों का सबसे ज्यादा नुकसान इसी सोरेन परिवार ने किया है।

झारखंड में पूर्व के मुख्यमंत्रियों ने कितना और वर्तमान मुख्यमंत्री कितना कर रहे हैं, इसका आकलन तो जनता स्वयं करेगी लेकिन पूर्व और वर्तमान मुख्यमंत्री अपने- अपने स्तर से यहां की समझदार जनता को समझाने -बुझाने में लगे हैं।

मुख्यमंत्री कई जरूरी और कठोर फैसले तो कर रहे हैं लेकिन झारखंड में शराबबंदी के मुद्दे को पहले ही नकार चुके हैं कि उससे कुछ नहीं होगा। बिहार मेंतो अब इसकी होम डिलीवरी हो रही है। जरूरी है जन- जागरूकता। इसके लिए कदम उठाए जाने चाहिए। पर वहीं पारा शिक्षकों को गुण्डा तक करार दिया। और अब इन्हीं गुण्डा-शिक्षकों से काम पर वापस लौटने की गुहार भी लगाई जा रही है। अब ये पारा शिक्षक और मुख्यमंत्री दोनो एक-दूसरे के अनुकूल हैं या नहीं, और अनुकूल हो सकेंगे या नहीं ये तो अलग संकट है। इस संकट का समाधान भी ऐसी कठोरता या जिद में नहीं है अल्कि दोनो पक्षों की सुदृढ़ वार्ता से ही संभव है।

लेकिन कप्तान और पूर्व कप्तान की जंग में टीम का संतुलन न बदल जाए, इसके लिए जरूरी है कि दोनो संयम और शालीनता से काम लें। अन्यथा हेमंत सोरेन इसे अपना बपौती राज्य बताते रहेंगे और रघुवर दास सोरेन परिवार को लेकर अपनी तमाम जानकारियां बांटते रहेंगे।

अभी पिछले दिनों मुख्यमंत्री रंघुवर दास ने दुमका के जामा विधानसभा क्षेत्र में हुए एक चैपाल में जानकारी दी कि जमशेदपुर छोड़ कर कहीं भी उनकी एक इंच जमीन या मकान नहीं है। जबकि विधायक सीता सोरेन का जमशेदपुर के धालभूम में रिसाॅर्ट है।

रघुवर दास लगातार हेमंत सोरेन और उनके परिवार पर निशाना साधे जा रहे हैं। विगत दिनों रामगढ़ में अपने एक संबोधन में उन्होंने कहा कि झामुमो बाप-बेटे-बहू की पार्टी है, जिसमें मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री उसी परिवार से बनता रहा है लेकिन विकास के प्रति कभी वह सोच दिखाई नहीं। और भ्रम फैलाते रहे कि अगर भाजपा सरकार में आएगी तो आदिवासियों की जमीन छीन लेगी। कुल मिलाकर जो विरोध राष्ट्र स्तर पर भाजपा का कांग्रेस से है वही विरोध झारखंड में झामुमो से दिखता है।

उधर हेमंत सोरेन भी अपना मोर्चा संभाले हुए हैं। उन्होंने सीएम के बयानो पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अपनी विदाई की वेला नजदीक देख, मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह की भाषा का प्रयोग बिल्कुल आम बात हो गई है। इसके लिए उन्हें झारखंड की जनता से माफी मांगनी चाहिए। वैसे अब वह माफी भी मांगेंगे तो जनता उन्हें माफ नहीं करेगी। उनकी भाषा बताती है कि झारखंडियों व मूलवासियों के प्रति उनकी मानसिकता क्या है।

वैसे यहां कौन-कौन माफी मांगे और किस-किस गुनाह के लिए माफी मांगे, यहां हमाम में तो सभी नंगे हैं। इन दोनो की इस जुबानी जंग की आदी होते जा रही है झारखंड की जनता।

लेकिन इस तरह झारखंड राज्य के सभी वासिंदों के निज राज्य की भावना को दरकिनार कर झारखंड राज्य को बपौती बताना या किसने कितनी जमीन हड़प ली उछालना जैसी बातें बताती हैं कि दोनो कितनी ज्यादा अस्त-व्यस्त स्थिति का सामना कर रहे हैं।

वर्ना बेख्याली में झारखंड के ये नेता हर वो सीमा पार करने को आतुर हैं जहां से उनके हिसाब से उनके मतलब की गुंजाईश दीख पड़ती है। पद की गरीमा का कोई ख्याल नहीं, कोई मलाल नहीं! ये भी नहीं कि झारखंड की जनता कितनी आहत होती है, कितनी शर्मीन्दा होती है!!

दोनों ही अपने-अपने पक्ष के मुखिया हैं। अतिवाद किसी को नहीं शोभता। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तब तो झारखंड की जनता इसके लिए सिर्फ प्रार्थना कर सकती है कि दोनो इस आवेशग्रस्त स्थिति से मुक्त हों और झारखंड राज्य की जनता के कल्याण की सोचें। झारखंड की जनता के धैर्य की परीक्षा न लें।

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