आज झारखण्ड भाजपा के आत्मविश्लेषण का दिन है

अतिश्योक्ति नहीं गर कहा जाये कि आज झारखण्ड भाजपा के आत्मविश्लेषण का दिन है. झारखण्ड भाजपा कभी भी झारखंडी-भाजपा बन पाई ही नहीं लगता है. सिंहासन पर गद्दीनसीन होने के बाद अगर किसी राज्य में भाजपा का मिजाज़ बेकाबू हुआ है तो वो है झारखण्ड. स्थानीय सरकार ने कहीं न कहीं जनता के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं से भी मुहँ मोड़ लिया था ऐसा ही प्रतीत होता है.  पूरे भारत में चुनाव के वक़्त प्रधानमंत्री जहाँ-जहाँ गए भाजपा को अच्छा रिजल्ट प्राप्त होता रहा है. परन्तु फेल होने की स्थिति तभी बनती है जब स्थानीय सरकार अपनी स्थानीय जनता को बहुतेरे क्षेत्रों में असंतुष्ट और नाराज़ रख छोड़ा हो. और झारखण्ड में तो जनता और कार्यकर्त्ता दोनों नाराज़ है.

झारखण्ड में फ़क़त दो उपचुनाव हुए और दोनों में भाजपा को इस नाराज़गी का मोल चुकाना पड़ा. क्या राज्यप्रमुख को इसमें अपनी जनता की नाराजगी नज़र नहीं आती? क्या भाजपा केंद्रप्रमुख इसी जनअविश्वास और जागीरदार के भरोसे 2019 के चुनाव जीतने का सपना संजो सकते हैं?  तो क्या आज झारखण्ड भाजपा के आत्मविश्लेषण का दिन नहीं है?

बमुश्किल मजबूत बनाई हुई भाजपा की जड़ें अब कमज़ोर पड़ने लगी हैं झारखण्ड में. एक तरफ तरक्की के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा नित्य नए प्रयोग हो रहे हैं वही स्थानीय भाजपा सरकार बस उसी के गुणगान को अपना कर्मफल बतला-बतला कर खुशफहमी का शिकार हो रही है. वस्तुतः झारखण्ड में अबकी बार की भाजपा सरकार के आने के बाद कुछ नया (केंद्र सरकार की चंद परियोजनाओं को छोड़कर) क्या हुआ है यह सोचनीय है. और केंद्र सरकार की परियोजनाएं भी झारखण्ड के CSC द्वारा आधारहीन आंकड़ों का काल्पनिक निर्माण मात्र रही हैं. और मुख्यमंत्री बिना जांचे-परखे इन आधारहीन आंकड़ों को सार्वजानिक कर के फंसते रहे हैं. विगत दिनों ऐसे कई उदाहरण सामने आये जहाँ सरकार ने अपने कार्यक्रमों की सफ़लता की घोषणायें कीं, पुरस्कार प्राप्त किये, पुरुस्कार वितरित किये परन्तु उक्त परियोजना जमीनी स्तर पर सरकार की इज्ज़त उछाल गईं. आज झारखण्ड में करीब करीब हर जिलाधिकारी आंकड़े जमा करने में बस व्यस्त कर दिया गया है. सूबे की भाजपा सरकार को अब आंकड़ों के खेल पर आधारित राजनीति बंद कर देनी चाहिए. कम से कम 2019 चुनाव तक तो जरुर और अपने बिखरते लोगों को इकठ्ठा करना होगा ताकि झारखण्ड जनमानस फिर से एकजुट होकर भाजपा की ओर उम्मीद भरी नगाहों से देख सके.

अब झारखण्ड में लोग सरेआम कहने लगे हैं कि झामुमो सरकार में बहुतेरे सच्चे नेता नहीं निकले पर इस सरकार की तरह निठल्ली सरकार नहीं थी जो सिर्फ बनावटी आंकड़ों के आधार पर शासन करती थी. इस भाजपा सरकार की निरंकुशता से भी लोगों को बहुत शिकायतें हैं. झारखण्ड की जनता छलप्रपंच की मानसिकता नहीं रखती है. भोलीभाली जनता बहुत जल्द विश्वास कर लेती हैं पर जब कोई उस विश्वास को तोड़ देता है तो फिर जल्दी चित्त पर नहीं चढ़ता. रघुवर सरकार ऐसी ही एक सरकार आई है जो नरेन्द्र मोदी द्वारा स्थापित विश्वास को मटियामेट कर रही है आदि आदि…… विचारणीय बिंदु ये है कि कैसे किसी प्रान्त की जनता सरकार के विरुद्ध हो सकती है जहाँ केंद्र और प्रान्त दोनों जगह एक ही पार्टी एक ही मानसिकता की सरकार है? विचारणीय बिंदु ये है कि वे क्या कारण हैं जो स्थानीय सरकार को अब सिरे  से ख़ारिज कर रहे हैं? विचारणीय बिंदु ये भी है कि क्या राज्य की शीर्ष सत्ता अब सबकुछ संजोकर न रखने में विफल साबित हो रही है? सिर्फ अपने लोगों का गुट निर्मित कर आंकड़े बनवाकर-भेजकर केंद्रशीर्ष को खुश रख लेने भर की शासन प्रणाली वाली मानसिकता से विलग होना होगा.

साथ ही केन्द्रीय भाजपा को भी झारखण्ड भाजपा के सहयोग के लिए और आगे आना होगा अब ऐसा ही प्रतीत हो रहा है. झारखण्ड भाजपा का सहयोगी दलों को खुश रखे रखना की कोशिश करते रहना भाजपा के अपने ही युवा-वृद्ध कर्मठ कार्यकर्ताओं का अब क्यों दल से मोहभंग कर रहा है इसकी विवेचना का समय आ गया है. वर्ना राजनीति में अपना कैरियर बनाने की उम्मीद में आये युवा कर्मठ भाजपाई कार्यकर्ता अन्य स्थानीय दलों में अपना भविष्य निहारने में देर नहीं लगायेंगे. जनता की तरह संगठन कार्यकर्त्ता भी जल्द अपना पाला बदल लेंगे.

झारखण्ड की जनता भोलीभाली सही पर क्या वो इतनी नासमझ समझ लेने लायक है कि एक ही राज्य में एक ही समय में एक ही चुनाव में एक जगह एनडीए-नियमावली और दूसरी जगह नन-एनडीए-नियमावली? आजसू के लंबोदर महतो को या फिर भाजपा के माधवलाल सिंह को, एनडीए’ एक ही उम्मीदवार खड़ा करती तो कुछ उम्मीद भी करती. और अगर आजसू बेकाबू हो गई थी तो भाजपा ने सही राजनितिक दाव क्यों नहीं लगाया? वोट गिरने से पहले ही आजसू से किनारा क्यों नहीं कर लिया? ये भाईवादी रिश्ता झारखण्ड की जनता भोलीभाली से छिपा नहीं रह पाया और जिस पार्टी (हेमंत सोरेन) ने भी इस सत्य को जनता के सामने उच्चारित कर दिया जनता ने उसको ही सच्ची पार्टी मान लिया. तारीफ ये कि इस अविश्वास की आंधी में लम्बोदर महतो का धनबल भी काम न आया. बेचारे लम्बोदर महतो का तो हाल ये हुआ कि “न ख़ुदा ही मिला विसाल-ए-सनम इधर के हुए उधर के हुए”; नौकरी भी गई और —– भी. पर आजसू से यहाँ क्या लेना देना. गड़बड़ी तो भाजपा के खेमे में हुई है.

झारखण्ड के दो छोरों पर दोनों उपचुनावों में करारी हार का सामना करना और वो भी एक ही पार्टी से; झारखण्ड भाजपा के लिए मात्र खतरे की घंटी नहीं है. झारखण्ड जनमानस का यह पलटता व्यवहार उसे झारखण्ड राज्य की जमीन से काफी वर्षों के लिए दूर कर सकता है. सोचनीय यह भी है कि उस एक बुरी तरह हराने वाली पार्टी ने क्या जनमानस को कोई नया ख्वाब दिखाया था या जनमानस हारपारकर फिर से स्थानीय पार्टी की ओर लौटी है?

कुल मिलकर विश्वास का टूटना ही इस बिखराव का मुख्य कारण प्रतीत होता है.  तो क्या इस टूटे हुए विश्वास के कारणों को ढूंढने के लिए ही सही; आज झारखण्ड भाजपा के आत्मविश्लेषण का दिन नहीं है?!

-पूर्णेंदु पुष्पेश

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