तारकेश्वर महतो “गरीब” की एक कविता

 :: मैं कुछ भी नहीं ::
               तारकेश्वर महतो “गरीब”

मैं कुछ भी नहीं हूँ
न दाँयें, न बाँये हूँ
न आग, न फेड़ हूँ
न गोंठ मेंं गिना जाता हूँ
न पाघा मेंं बाँधा जाता हूँ !

न पीछे किसी की फ़िक्र है
न आगे किसी की आस है
रूखा-सूखा को आँख बरसे
सुना है सागर को भी
दो बूँदो की प्यास है !

न घर है अपना
न ठिकाना कहीं
न कहीं मंजिल अपनी
न हमें जाना कहीं !
एक वक्त की रोटी तू ले आ
और एक वक्त की मैं !
तेरा भी कोई नहीं
और मेरा भी नहीं
तू मेरी रक्षा करना
और मैं तेरी करूँगा !

कितने आये और कितने गये
कितने आएंगे और चले जाएंगे,
वक्त को, वक्त पर, वक्त बताएगा
यें शरीर नश्वर है, मेरे हमसफर 
इस नेकी के बहाने
हमारा जीवन सार्थक हो जाएगा !!

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