खानापूर्ती अधिकारी बनने को मज़बूर क्यों हैं ये प्रशासनिक अधिकारी झारखण्ड में

झारखण्ड राज्य के खानापूर्ती अधिकारी!

जी हाँ, ये वैसे अधिकारी होते हैं जिन्हें अपने बचाव का सबसे अच्छा रास्ता यही सूझता है कि कागज़ी तौर पे मज़बूत रहा जाय और आंकड़ों में साहब बहुत ही मेहनती और सफल प्रशासक साबित हो जाएं। भले जमीन पर कागज़ों पे उकेरे अक्षरों का प्रतिबिम्ब भी परिलक्षित ना हो! ये बस खानापूर्ति करके अपना प्रोफाइल रिच करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ में दूसरों की लुटिया डुबो देने के चलन से इंकार नहीं किया जा सकता पर ‘जिम्मेदारी’ शब्द से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बाकी तफ़्सील तो बाद में; फिलहाल इनकी गैरज़िम्मेदारी बस इसी एक बात से साबित हो जाती है कि इनके कागज़ी आंकड़ों और यथार्थ में कोसो का फैसला कोई देख है। उफ़्फ़! ये इतने गैरजिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? आखिर इन सबने आईएएस या बीपीएससी/जेपीएससी एग्जाम निकाला है! कम या ज्यादा अंकों पर ही हो पर ट्रेनिंग तो सबको एक जैसी ही मिली थी, फिर ऐसी मानसिकता कहाँ से पनप गई इनमे? मान भी लिया जाय कि 2019 का चुनाव मज़बूरी है पर ऐसी क्या मज़बूरी कि जनता की ही लगा दी जाय!

जी हाँ! झारखण्ड में ज्यादातर उच्चाधिकारी खानापूर्ती अधिकारी बनने को मज़बूर हैं। व्यक्तिगत आरोप लगा कर कोई इनसे दुश्मनी लेने की हिमाक़त नहीं कर सकता, फिर मेरी या आम जनता की क्या औक़ात! लेकिन छटपटाहट तो होती ही है जब स्थानीय विधायक या सांसद आगामी चुनावों में अपना हित साधने के लिए अपनी ज़ात/ज़मात का कोई उच्चतम प्रशासनिक अधिकारी को अपने चुनाव प्रक्षेत्र में ले आते हैं और उन्हें अपना जायज़/नाज़ायज़ मनमानी करने को मज़बूर करते हैं। और तब ये उच्चाधिकारी इलाके के उस नेता की झूठी प्रोफाइल  बनाने चक्कर में खानापूर्ती अधिकारी बनने को मज़बूर हो जाता है। और प्रशासनिक अधिकारी बनने से पूर्व के लिए गए अपने प्रशिक्षण और शपथ को घोर कर पी जाता है। साथ ही अपने मातहत सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के लिए ओपन स्पेस/एयर प्रदान कर रहे हैं। क्या इन कम मज़बूत मेन्टल स्टेटस के प्रशासनिक अधिकारियों को जनता के प्रति जरा भी जवाबदेही नहीं महसूस होनी चाहिये?

भारत सरकार और प्रधान मंत्री ने इन्हीं के भरोसे बड़ी-बड़ी कल्याणकारी योजनायें/परियोजनाएँ धरातल पर लाने का बीड़ा उठाया है और जब ये प्रशासनिक अधिकारी ही सरकार व जनता के भरोसेमंद नहीं रह जायेंगे तो कोई सरकार या कोई दूरद्रष्टा प्रधानमंत्री भी नहीं काम आएगा। आश्चर्य होता है जब झारखण्ड के ऐसे अनेक खानापूर्ती अधिकारी बड़ी-बड़ी कल्याणकारी योजनाओं व परियोजनाओं का कचड़ा करते हुए प्रधानमंत्री और जनता दोनों को धता बता रहे हैं! ये कागज़ी कार्रवाई और मीटिंग व महँगी यात्रायें दिखा के पैसा बर्बाद कर दे रहे हैं। और फिर खानापूर्ती का खेल शुरू  हो जाता है। बेचारे लाभुक मुँह ताकते रहते हैं और बनावटी आंकड़ों के दम पर जिला ‘बेस्ट जिला’ घोषित/नामित हो जाता है।  कई मौके पर तो जिलाधिकारी को इन्हीं बनावटी आंकड़ों के आधार पर सम्मानित भी कर दिया जाता है।

आजकल झारखण्ड में ज्यादातर उच्चाधिकारी इसी नई परिपाटी पर काम कर रहे हैं। अधिकांशतः जिलाधिकारी आजकल खूब सारी ‘समीक्षा बैठक’  कर रहे हैं और उनके DPRO उनका पाण्डुलिपीकरण! उन्हें पता है कि पीएमओ कभी धरातल देखने आएगा नहीं और धरातल तो वही दिखेगा जो  पाण्डुलिपि के कागज़ों में उकृत  होगा। आखिर धरातल पर कोई आता क्यों नहीं?! और एक प्रशासनिक अधिकारी अपनी गरिमा से निचे उतर कर सिपाही तक से क्यों भिड़ जाता है? क्यों एक प्रशासनिक अधिकारी जनता दरबार तो  लगता है और वही जनता को उनकी मांगो पर सांत्वना न देकर डाँटता है धमकाता है? ऐसे क्या गुरूर? और भाई मेरे क्यों सभी मातहत अधिकारी भी आंकड़े बनाने और आंकड़े बैठने को मज़बूर हैं? और क्यों…..? इन्हें तो ये भी डर नहीं कि अगर पीएमओ इनके आंकड़ों की जाँच पे उतर जाय तो ऐसे सभी प्रशासनिक अधिकारीयों का अंज़ाम क्या होगा?!

एक जागरूक भारतीय नागरिक की तरह मुझे भी बहुत कठोर कुछ कह डालने की इच्छा होती है जो इनके कारण व्याप्त उसी छटपटाहट का नतीजा है पर शायद इनकी तरह ही मज़बूर हूँ। ये खानापूर्ती अधिकारी बनने को मज़बूर होने का कोई और कारण बताएँगे मैं आम जनता की मज़बूरी का कारण। पर सदा ऐसे  तो नहीं चलेगा न? जहाँ जनता को अपने निज स्वार्थ से आगे की भी सोच को धरातल पर लाना होगा वैसे ही इन खानापूर्ती अधिकारियों को फिर से उच्चाधिकारी बनना होगा।

अभी के लिए बस, वर्ना कहीं……. ?

आँकड़े  छीलने बैठा तो छीलन की स्थिति न बन जाये!

-पूर्णेन्दु पुष्पेश 

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