मुश्किल दौर में विपक्ष

राजनीति में बहुत कुछ स्पष्ट नहीं होता या कि कहिए कि जैसा दिखता है ठीक वैसा ही नहीं होता। इसी का परिणाम होता है कि कई बार इस राजनीति का ठीक-ठीक आकलन कर पाना संभव नहीं होता। या फिर आकलन कुछ कहता है और नतीजा कुछ और ही सामने आता है। कई बार वंशवाद के ठप्पें के कारण अपेक्षाकृत कम उपलब्धियों या बिना उपलब्धियों के भी कुछ लोग शीर्ष पर होते हैं तो कुछ जड़ों से जुड़े होने और अथक परिश्रम के बावजूद वहां तक नहीं पहुंच पाते जैसी कि अपेक्षा की जानी चाहिए। कुछ अपवादों को छोड़कर।

यह सुनने में किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए कि राहुल गांधी ऐसे ही नेता हैं जिन्हें विरासत में राजनीति तो मिली है लेकिन बहुत हाथ-पांव मारने के बाद भी वे राजनीति में ऐसा कुछ नहीं कर पा रहे हैं जैसा कि उनके पूर्वजों ने कर दिखाया है। उन तक पहुंचते-पहुंचते कांग्रेस की जो हालत हो गई है, इसके लिए ठीक-ठीक उन्हें जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि खुद राजीव गांधी की जब सरकार बनी थी तो संसद में वे प्रचंड बहुमत के साथ आये थे। तब उनके पास संसद में 410 सीटें थी। निश्चित ही इसमें इंदिरा गांधी के बाद उनकी सहानुभूति वाली सीटें भी शामिल थी। लेकिन जब राजीव गांधी अपने दम पर चुनाव में आये तो उनकी सीटें आधी रह र्गईं। ततपश्चात राहुल गांधी तक आते-आते तो कांग्रेस को विपक्ष तक का दर्जा देने में भी अड़चनें आने लगी। हालांकि इधर इनके कई प्रयासों सेकांग्रेस में जान जरूर आई है। मगर इसे विश्वासपूर्वक अभी भी देश की सबसे बड़ी पार्टी कहने में संकोच ही होगा क्योंकि कई क्षेत्रीय पार्टियां इससे बेहतर स्थिति में कही जा सकती हैं। कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि कुछ अच्छे लोगों ने अभी भी इसका दामन थाम रखा है। कुछ भाजपा या अन्यत्र भी भाव नहीं मिलने के कारण इसमें शामिल हुए जा रहे हैं। ऐसे में 2019 के चुनाव ने भी इसकी मुश्किलों को बनाये और बढ़ाये रखा है।

राजनीतिक दलों के दलदल ने भी लंघी मारने और अपने वजुद को बचाने के लिए जब तब इससे समझौते तो किये और गठबंधन के संकेत भी किये लेकिन नेतृत्व के नाम पर राहुल गांधी को स्वीकारने में सबको आपत्ति हो गई। सबके अपने ही सपने हैं और मोदी को हराने के नाम पर सब एक मंच पर आ तो जाते हैं। किंतु प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के नाम पर सब एक दूसरे के नाम से असहमत हो जाते हैं। यहीं विपक्ष कमजोर होता चला जाता है।

तो क्या ऐसे में फिर एक बार मोदी सरकार या हर हर मोदी घर घर मोदी जैसी बातें सच होंगी। हालांकि पिछले चुनाव में मोदी के नाम पर मिले वोटों का प्रतिशत कुल वोटों का 31 प्रतिशत ही था। लेकिन कांग्रेस के दस सालों से असंतोश के बाद राहत की सांस लेने के लिए लोगों ने भाजपा को चुना था और इसे मोदी लहर का नाम दिया गया था। मुझे नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व पर कोई संदेह नहीं लेकिन जिन शीर्श लोगों को मोदी के नाम पर दरकिनार कर दिया गया था उनमें से कोई भी होता तो शायद स्थिति यही होती। जैसे टमाटर और प्याज के दामों ने पहले भी सरकारे गिराई हैं, कांग्रेस का भी उस समय यही हश्र होना था। लोगों को गैस-पेट्रोल के दाम बढ़ते दिख रहे थे। लोग महंगाई के नाम पर कांग्रेस को कोसने लगे थे। कांग्रेस को कोसने और बढती महंगाई का रोना रोने में सुशमा स्वराज, स्मृति इरानी, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली आदि ने विभिन्न तरह के नाटक किये थे।

हालांकि यह असंतोश अब भी है। कुछ लोगों को नाराजगी है कि मोदी ने जितने वादे किये थे उस हिसाब से काम नहीं हुआ। लेकिन कोई स्पश्ट विकल्प न होने के कारण यह मजबूरी भी बनी हुई है कि मोदी नही ंतो फिर कौन? मोदी के किसी विरोधी में यह कुव्वत नहीं कि सही विकल्प के रूप में खडा होना तो दूर किसी को खडा भी कर सकें। नीतीश के स्वर में वह विरोध दिखा था। मगर भाजपा की रणनीति के सामने वे ढ.ेर हो चुके हैं। शेश दलों में राजद की हालत किसी से छिपी नहीं है। सपा की टूटन का दर्द सपा ही बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। बसपा का हाथी खुद चलने को तैयार नहीं है। ममता खुद को इतना बड़ा मानती हैं कि गठबंधन तो चाहती हैं लेकिन ढे़र सारे सवाल वह खुद साथ लिए फिरती है जिसका जवाब उनके साथियों के पास नहीं है। कांग्रेस जैसी पार्टी जो कभी देश की बड़ी पार्टी हुआ करती थी, वह तो जितना सिमटती जा रही है उससे एक दिन विलीन हो जाने जैसी संभावनायें भी दिखने लगती हैं। वैसे पिछले दिनों हुए चुनावों ने राहुल गांधी की छवि थोड़ी संभाली जरूर थी मगर वह कितना कारगर होगी यह आने वाले चुनाव ही बता सकेंगे।

मोदी और उनकी सरकार ने कुछ कदम सबके साथ सबके विकास के जरूर उठाये मगर वह कदम उल्टे साबित हुए। जिससे सरकार को तो लाभ हुआ लेकिन कई रोजगार धंधों को नुकसान हुआ, बेरोजगारी बढ़ी। काले धन के आने की संभावनायें तलाशती सरकार अब 2019 के चुनाव में कारगर होने की संभावनायें तलाश रही है।

संभव है इस चुनाव में भाजपा सफल भी हो जाए मगर इस सफलता का श्रेय भी कांग्रेस और अन्य कमजोर पार्टियों को देना होगा जिनकी गड़बड़, दोहरी और बिखरी ीर्न नीतियों में सुधार नहीं होने के कारण ही शायद भाजपा सफल हो जाए और अन्य पार्टियों को फिर से पांच साल के लिए सरकार की खामियां निकालने का समय मिल जाएगा।

संबंधित समाचार