बहिस्कार तो मीडिया ने कभी सीखा ही नहीं

जौ के साथ घुन का पिस जाना एक चर्चित मुहावरा है। …झारखंड स्थापना पर्व के सुअवसर पर पारा शिक्षकों के साथ ही पत्रकारों के साथ जो कुछ भी हुआ, इस मुहावरे को चरितार्थ करता दिखा। पारा शिक्षकों के विरोध के तौर तरीके को गलत बताते हुए सरकार ने उनपर पत्थरबाजी का भी आरोप लगाया है। लेकिन साथ ही मीडियाकर्मियों पर हुए हमले से समझा जा सकता है कि उस दौरान सरकार कितना असहज महसूस कर रही थी। चूंकि मीडियाकर्मियों के कैमरे छीने और तोड़े गए या ‘डिलीट’ कर दिए गए, इसलिए हकीकत की आधी-अधूरी तस्वीर ही सामने आ पाई पर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि वहां व्याप्त विरोध कितना तीव्र होगा या उक्त विरोध के दमन का तरीका कितना रोद्र!

सरकार को शायद यह अहसास हो चुका था कि हालात कितने बिगड़ गए हैं या मीडियाकर्मियों के कैमरे बाहर जाने के बाद हालात और कितने बिगड़ जाएंगे। अतः उन कैमरों के आने व विश्लेषण-ब्योरा प्रस्तुत करने की एक कड़ी को सरकारी आदेश पर संभवतः ध्वस्त करने की कोशिश की गई। लेकिन जो पत्रकार वहां मौजूद थे और उन्होंने खुली आंखों से जो कुछ देखा था उसे डिलीट करना संभव नहीं था।

झारखंड के विकास को देखते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘विकास को देखना है तो झारखंड जाओ’’, लेकिन यहां विकास अपने इतने रौद्र रूप में होगा, पूरा देश यह अनुमान भी नहीं लगा सकता। शिक्षक अपनी जिस विवश्ता के कारण भी मर्यादित तराके से विरोध करा पाए लेकिन सरकार ने भी जो कुछ किया उसे ‘मर्यादित’ कतई नहीं कहा जा सकता। सरकार ने चैथा स्तंभ कहे जाने वाले ‘प्रेस’ को भी नहीं छोड़ा और संभवतः इसके लिए उसके पास कोई दलील भी नहीं है। चाहे जिस अंदेशे में आकर सरकार ने यह कदम उठाया हो किन्तु यह उसका अहंकार भाव ही प्रदर्शित करता है और जो भविष्य हितकारी नहीं बनाता।

झारखंड सीएम अपने इस कठोर के बारे शिक्षकों के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग तो कर रहे हैं लेकिन पत्रकारों की पिटाई के मुद्दे पर चुप हैं। राज्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है इसे सि( करते हुए सरकार के मीडिया प्रकोष्ठ को इसके लिए भी कुछ विज्ञप्तियां जारी कर देनी चाहिए थी कि सरकारी विज्ञापनो का इंतजार है तो मीडिया ऐसे मौकों का कवरेज ना करें।

दूसरी तरफ पत्रकारों पर हमले कोई नई बात नहीं हैं। इस सबके बावजूद पत्रकार या जिन पत्रों की वे नौकरी बजा रहे हैं कितने मुखर हुए? कितना विरोध दर्ज किया गया? एक दिन भी सरकारी कवरेज छोड़ने या सरकारी समाचार ना छापने जैसी बातें नहीं की किसी ने।

…तो आईए! अलग-अलग सरकारी आयोजनों के लिए हेलमुट के साथ तैयार रहें। कल को जब फिर ‘सरकार’ दुत्कारेंगे…. यह तो उनकी राजनीति का हिस्सा है। इसमें हैरानी क्या और इन हमलों से परेशानी क्या! सही बहिस्कार तो मीडिया ने सीखा ही नहीं।

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