क्या भाजपा ने झारखण्ड को गंभीरता से नहीं लिया

पूर्णेन्दु पुष्पेश ::

क्या भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2019 में झारखण्ड राज्य को गंभीरता से नहीं लिया ? यह सवाल हठात सामने आ जाता है जब इस बार के सीटों के बंटवारे पर नजर जाती है। मोदी जी तथा उनकी टीम की यह सोच कहीं न कहीं सही हो सकती है कि आज पुलवामा प्रकरण के बाद देश भर में राष्ट्रीयता की जो भावना बनी है और नरेंद्र मोदी के प्रति विश्वास की लहर है उसमें कोई भी सीट पर चेहरा गौण हो जायेगा और पार्टी प्रमुख हो जाएगी। पर संभवतः यह पूरी तरह सत्य नहीं है। इलाके में विपक्ष में कौन खड़ा है, कौन-कौन भाजपाई सांसद अपने इलाके की जनता को कितना असंतुष्ट (इंकम्बेंसी फैक्टर) कर रखा है आदि आदि…. इन सब पहलुँओं को नकारा नहीं जा सकता।

झारखण्ड में बीजेपी के ताज़ा लिस्ट में फिलहाल जो 10 नाम आये हैं उनमे भले मुख्यालय ने अपने हिसाब से भाजपाई सांसदों के वर्तमान इलाकाई वज़न का ख्याल रखा  हो, यह सभी वर्तमान सांसदों पर सही बैठता नहीं दिख पड़ता। या यों कहें कि नए/युवा चेहरों ना लेकर इंकम्बेंसी का जो रिस्क लिया है वह शायद इस बार सफल नहीं हो।

अव्वल तो 14 में से जो एक सीट आजसू को दिया है वह गिरिडीह न हो कर सुदेश महतो के अपने गढ़ में होता तो बेहतर होता क्योंकि इस बार के माहौल में गिरिडीह निकाल लेना चन्द्रप्रकाश चौधरी के वश की बात नहीं दिखती। दो बड़े बाहुबलियों का सामना करना पड़ेगा इन्हें। एक तो  झामुमो के दबंग प्रत्याशी अब खुल कर सामने आ जायेंगे, दूसरे सीट न मिलने से असंतुष्ट रविंद्र पांडेय ब्राह्मणों व समर्थकों के वोट के साथ वोटकटवा का रोल अदा करते हुए एनडीए को खूब चूना लगाते दिख पड़ते हैं।  भाजपा का अपने सांसद को सज़ा देने का यह मौका सही पड़ता नहीं दीखता। कुल मिलाकर गिरिडीह में बीजेपी अपना कब्ज़ा खोटी नज़र आ रही है।

धनबाद में इस बार इंकम्बेंसी फैक्टर काफी असर दिखाता नज़र आ रहा है। जमीनी हक़ीकत पर आत्मविश्वास का अतिरेक भारी  पड़ सकता है बीजेपी को। वर्तमान सांसद से असंतुष्ट भाजपाई जनता और कार्यकर्त्ता भी इस बार नए नेतृत्व की अपेक्षा कर रहे थे जो धनबाद प्रत्याशी की घोषणा के बाद असंतुष्ट नज़र आये और जो धनबाद में मुख्य विपक्षी कांग्रेस को बल देता ही दिख पड़ता है।

घोषित अन्य सभी सीटों पर भी मामला इस बार पूर्व की भांति इतना सरल नहीं है कि मात्र मोदी जी का  नाम बेड़ा पार करवा दे। जिन तीन सीटों पर अभी नाम घोषित नहीं हुए हैं उनमे भी भाजपाई अपने खेमे में ही अपना बल दिखाने पर आ गए हैं।

…और, और आँकड़े आने के बाद !

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