कलशस्थापना के साथ मां उग्रतारा मंदिर में 16 दिवसीय नवरात्र शुरू

हजार वर्ष पुराना है यह मंदिर, यहाँ की पूजा पद्धति भी है अलग

दीपक/CHANDWA :: प्रखंड मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर रांची-चतरा मुख्य मार्ग से पश्चिम की ओर लगभग एक किलोमीटर दूरी पर स्थित मां उग्रतारा मंदिर में कलश स्थापना के साथ 16 दिवसीय नवरात्र शुरू हो गया। लगभग हजार वर्ष पुराना माना जाता है। अष्टादश भुजा का कलश मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया गया। बुधवार को मंदिर के पुजारियों द्वारा विशेष पूजा अर्चना की गयी तत्पश्चात बली दी गई। मंदिर पुजारी पं0 गोविन्द बल्लभ मिश्र व अन्य ने बताया कि 16 दिवसीय नवरात्र पूजन की परम्परा के अनुसार दिन में दो बार भोग लगाया जाता है। सुबह में शरबत व शाम को तिखूर के हलवे के साथ पेचकी को भूनने के बाद गुड़ में पका कर भोग लगाया जाता है। मातृनवमी से अमावस्या तक नित्य मां उग्रतारा के आरती के बाद कलश पूजन किया जाएगा। इधर कलश स्थापना के बाद ही बकरे की बलि आरंभ कर दी जाती है। वह अष्टमी नवमी के संधि काल में कड़ा की बलि दी जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस 16 दिवसीय पूजा में किसी तरह की भी विपत्ति आने के बाद भी उन्हें मंदिर छोड़ने की मनाही है।

प्रसाद के रूप में चढ़ते हैं गड़ी, मिश्री और मोहनभोग: भारत के अति प्राचीनतम मंदिरों में एक इस मंदिर के पुजारी श्रद्धालुओं का प्रसाद माता भगवती को भोग लगाकर वापस करते हैं। श्रद्धालुओं को अंदर के कमरे में प्रवेश की मनाही होती है। प्रसाद के रूप में गड़ी, मिश्री व मोहनभोग चढ़ाया जाता है। मोहनभोग मंदिर का रसोइया ही बनाते हैं। दोपहर के समय मां भगवती को पुजारी उठाकर रसोई में ले आते है। जहां भात, दाल और सब्जी का भोग लगाया जाता है।

दुर्गा पूजा और रामनवमी में होती है विशेष पूजा: शक्तिपीठ के रूप में स्थापित इस मंदिर में रामनवमी व दुर्गापूजा में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यूं तो इस मंदिर में सालोभर भीड़ रहती है लेकिन दशहरा, रामनवमी व पूर्णिमा के दिन अपार भीड़ लगती है। सिर्फ नवरात्र के बीच लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते है और माता की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि जो सच्चे दिल से माता की उपासना करते हैं उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

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