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झारखंड में कितने पत्रकार

अभी हाल में सूचना जनसंपर्क विभाग के सचिव सह मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डाॅ. सुनील कुमार वर्णवाल ने सूचना भवन में एक बैठक में कहा कि राज्य के मीडिया कर्मियों को सरकार स्वास्थ्य बीमा योजना से जोड़ेगी। मीडिया कर्मी और उनके परिवार को स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा। आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य बीमा के तर्ज पर ही मीडिया कर्मियों को भी स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाएगा। इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि अधिक से अधिक मीडिया कर्मी को इसका लाभ मिल सके। इसके कार्यान्वयन के लिए गठित समिति…

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क्या मुकेश बोकारो का आखिरी रसूखदार घूसखोर है?

पूर्णेन्दु पुष्पेश: केन्द्र से लेकर राज्य तक चाहे जिसकी भी सरकार आ जाए, भ्रष्टाचार खत्म करने के चाहे जितने दावे हों, लेकिन बिचैलिए ना तो किसी से डरे हैं और ना तो किसी से शायद डरेंगे। इन बिचैलियों ने हमेशा से सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। अभी ताजा मामला बोकारो के आपूत्ति विभाग के नाजीर मुकेश कुमार का है जिसे एसीबी ;भ्रष्टाचार निरोधक इकाईद्ध की टीम ने 71 हजार रूपये घूस लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा है। संभव है यह बहुत बड़ा मामला नहीं हो। इस नाजीर ने इससे…

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घोषणाएँ मूर्त्तरूप भी लें….

सम्पादकीय : पूर्णेन्दु पुष्पेश  घोषणाएँ मूर्त्तरूप भी लें…. भारत में हर साल रोजगार की कतार में लोग जुड़ते जा रहे हैं। वहीं रोजगार का औसत घटता जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय संगठन (आईएलओ) के अनुसार भारत में बेरोजगारों की संख्या इस वर्ष के अंत तक एक करोड़ छियासी लाख हो जाने का अनुमान है। जबकि आउटलुक के एक सर्वे के अनुसार भारत में इस साल बेराजगारों की संख्या में तीस लाख की बढ़ोत्तरी होगी। केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार राज्यंत्री ने संसद में इन आंकड़ो को लेकर पूछे गए सवालों के जवाब…

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झारखंड हमारा बपौती राज्य है: हेमंत

बेख्याली में झारखंड के नेता हर वो सीमा पार करने को आतुर हैं जहां से उनके हिसाब से उनके मतलब की गुंजाईश दीख पड़ती है। पद की गरीमा का कोई ख्याल नहीं, कोई मलाल नहीं! ये भी नहीं कि झारखंड की जनता कितनी आहत होती है, कितनी शर्मीन्दा होती है!! पूर्णेन्दु पुष्पेश : ‘‘झारखंड हमारा बपौती राज्य है। हम यहां के आदिवासी- मूलवासी हैं। हम धरती का एक हिस्सा हैं और हमसे ही कोई हिसाब मांगता है? सीएम को शर्म आनी चाहिए। मालिक से कोई हिसाब मांगता है!’’ -ये बातें…

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पारा शिक्षकों का तारणहार कौन?

मनीष : झारखंड के स्थापना दिवस के दिन यहां के पारा शिक्षकों के साथ जो कुछ हुआ, उसके बाद घमासान मचा हुआ है। ऐसे में यह कहना कठिन है कि उनके हितों की कितनी रक्षा होगी लेकिन हर राजनैतिक दल उनका हितैषी बनने की कोशिश कर रहा है। जहां रघुवर सरकार इन पारा शिक्षकों को गुंडा तत्व बताते हुए कठोर कदम उठाने पर तुली है वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे अलग रंग देते हुए इसे बाहरी- भीतरी का मामला बना दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री सोरेन ने सरकार द्वारा…

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मुश्किल दौर में विपक्ष

राजनीति में बहुत कुछ स्पष्ट नहीं होता या कि कहिए कि जैसा दिखता है ठीक वैसा ही नहीं होता। इसी का परिणाम होता है कि कई बार इस राजनीति का ठीक-ठीक आकलन कर पाना संभव नहीं होता। या फिर आकलन कुछ कहता है और नतीजा कुछ और ही सामने आता है। कई बार वंशवाद के ठप्पें के कारण अपेक्षाकृत कम उपलब्धियों या बिना उपलब्धियों के भी कुछ लोग शीर्ष पर होते हैं तो कुछ जड़ों से जुड़े होने और अथक परिश्रम के बावजूद वहां तक नहीं पहुंच पाते जैसी कि…

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बहिस्कार तो मीडिया ने कभी सीखा ही नहीं

जौ के साथ घुन का पिस जाना एक चर्चित मुहावरा है। …झारखंड स्थापना पर्व के सुअवसर पर पारा शिक्षकों के साथ ही पत्रकारों के साथ जो कुछ भी हुआ, इस मुहावरे को चरितार्थ करता दिखा। पारा शिक्षकों के विरोध के तौर तरीके को गलत बताते हुए सरकार ने उनपर पत्थरबाजी का भी आरोप लगाया है। लेकिन साथ ही मीडियाकर्मियों पर हुए हमले से समझा जा सकता है कि उस दौरान सरकार कितना असहज महसूस कर रही थी। चूंकि मीडियाकर्मियों के कैमरे छीने और तोड़े गए या ‘डिलीट’ कर दिए गए,…

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खानापूर्ती अधिकारी बनने को मज़बूर क्यों हैं ये प्रशासनिक अधिकारी झारखण्ड में

झारखण्ड राज्य के खानापूर्ती अधिकारी! जी हाँ, ये वैसे अधिकारी होते हैं जिन्हें अपने बचाव का सबसे अच्छा रास्ता यही सूझता है कि कागज़ी तौर पे मज़बूत रहा जाय और आंकड़ों में साहब बहुत ही मेहनती और सफल प्रशासक साबित हो जाएं। भले जमीन पर कागज़ों पे उकेरे अक्षरों का प्रतिबिम्ब भी परिलक्षित ना हो! ये बस खानापूर्ति करके अपना प्रोफाइल रिच करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ में दूसरों की लुटिया डुबो देने के चलन से इंकार नहीं किया जा सकता पर ‘जिम्मेदारी’ शब्द से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बाकी तफ़्सील…

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भर पेट खाना और पेट भर “…….” ही सफलता है तो दोनों जंतुओं में असमानता क्या है?

: पुर्णेन्दु पुष्पेश : भर पेट खाना और पेट भर “…….”, इससे ज्यादा कोई कुछ करे तो ‘सफलता’; वर्ना दोनों जंतुओं में असमानता क्या है? कुछ की चार बातें सुन लेना, कुछ को चार बातें सुना देना; किसी के लिए नारे लगा देना, किसी के लिए मौन धारण कर लेना; वस्तुतः क्या यही सफलता का पैमाना है? प्रौढ़ों ने तो अपने जीवन का एक ट्रैक बना लिया है. संभवतः बूढ़े तोते पोस नहीं मानेंगे! पर क्या युवाओं का ट्रैक भी यही है? वे युवा जिनके बच्चे बड़े हो रहे हैं वे…

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अपने प्रिय मित्रों से विनम्र अनुरोध

अपने प्रिय मित्रों से विनम्र अनुरोध  आपका प्रिय मीडिया संस्थान ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’ आपको लगातार झारखण्ड के सभी जिलों की लोकल ख़बरों से अवगत करता रहता है. न्यूज़ पोर्टल को अबाधित रूप से चलाने में आप सब का दोस्ताना सहयोग हमारे लिए अमूल्य है. आपसे मित्रवत अनुरोध है कि ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’ के इस पोर्टल तथा ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’ के निम्न्लिखित लिंक को सबस्क्राइब कर हमे आपका सहयोग प्रदान करें…. http://www.youtube.com/c/RMNEWSTVCHANNEL

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