फिल्म का विरोध या मूंछ की लड़ाई

हमारे समाज में फिल्मों का विरोध कोई नई बात नहीं है. फिल्म निर्माण के प्रारंभिक कल से ही विरोध भी होता रहा है. सामाजिक बंधनों के कारण ही प्रारंभिक दौर में फिल्मों में में स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष निभाया करते थे. धीरे धीरे स्वीकार्यता मिलने के साथ स्त्रियां इस क्षेत्र में आईं और खूब नाम भी कमाने लगीं. हिन्दू मुस्लिम खाई भी शुरू से चली आ रही है. फिर भी इस विषय पर फ़िल्में बनती रहीं और चलती भी रहीं. सभी जानते हैं कि जोधा अकबर को लेकर कई फ़िल्में बनी हैं. छुटपुट विरोध भी होता रहा, लेकिन उसने कभी ऐसा हिंसक रूप नहीं लिया, जैसा कि आज संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को लेकर हो रहा है. विरोध हुआ तो सेंसर बोर्ड, राजनीतिक स्तर पर या फिर अदालतों के माध्यम से मामला निबटा लिया गया. लेकिन इस बार पद्मावत के मामले को राजपूत समाज खासतौर से उसके एक तबके करणी सेना ने अपनी मूंछ का सवाल बना लिया है और वह अदालत के फैसले को भी मानने को तैयार नहीं है. वह सड़कों पर उतरकर व्यापक हिंसा में लिप्त है. इससे राष्ट्र के जनधन की भी भारी क्षति हो रही है, जो नाकिबिलेबर्दाश्त है.

यदि फिल्मों के विरोध के हाल के इतिहास पर नजर डालें तो कुछ निर्माता निर्देशकों के नाम ऊपर तैरते दिखाई देंगे जिनका शगल ही ऐसी फ़िल्में बनाना है, ताकि कोई तबका नाराज हो और उनके विरोध से फिल्म को पब्लिसिटी मिले. संजय लीला भंसाली इसमें सबसे आगे खड़े नजर आते हैं. उनकी पिछली फिल्म रामलीला को लेकर भी बखेड़ा हुआ और फिर अदालत के आदेश पर फिल्म नाम बदलकर ‘गोलिओं की रासलीला- रामलीला’ के नाम से रिलीज़ हुई. विवादित विषय उठाने में अनुराग कश्यप भी माहिर हैं.

कश्यप का नाम ही सुर्ख़ियों में तब आया जब उन्होंने 1993 मुंबई विस्फोटों पर केंद्रित फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ बनाई. तीन साल तक बैन रहने के बाद यह 2007 में रिलीज़ हो सकी थी. इसके अलावा उन्होंने पांच, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी फ़िल्में बनें, जो अभद्र भाषा और भीषण हिंसा के कारण विवादित रहीं.

विवादों की हवा देकर फिल्मों को चर्चित बनाने के मामले में दीपा मेहता भी अग्रणी पंक्ति में हैं. दीपा की फिल्मों के विषय प्रायः सेक्स या होमोसेक्सुअलिटी रहे हैं.

याद कीजिये उनकी भारतीय विधवाओं को लेकर बनाई गई ‘वाटर’, जिसकी शूटिंग में भी पद्मावत की तरह बाधाएँ आईं थीं. इस फिल्म के निर्माण में दीपा के साथ अनुराग कश्यप भी थे. दीपा की फिल्म ‘फायर’ ने समाज में भारी आग लगाई थी. लेस्बियन कंटेंट के कारण शिवसेना समेत अनेक हिन्दू संगठनों ने इसका विरोध किया था.

विवाद के चलते सेंसर ने इसे बैन भी किया था. इसी तरह के विषय पर एक फिल्म ‘पिंक मिरर’ आई थी, जिसने दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवलों में वाहवाही लूटी थी. इसे भी भारतीय सेंसर बोर्ड ने बैन किया था.

शेखर कपूर भी विवादित विषयों के माहिर खिलाडी मने जाते हैं. उन्होंने चर्चित डाकू फूलन देवी के जीवन पर केंद्रित फिल्म बैंडिट क़्वीन बनाई जिसके सेक्ससुअल कंटेंट और अभद्र भाषा के कारण सेंसर ने बैन कर दिया था.

अभिनेत्री सीमा विश्वास के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके निर्वस्त्र दृश्यों के कारण फिल्म ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं. कुछ फ़िल्में राजनीतिक विवादों को हवा देने से भी चर्चित हुईं, जैसे किस्सा कुर्सी का, आंधी, इंदु सरकार और उड़ता पंजाब. 1993 के मुंबई बम कांड की पृष्ठभूमि में पनपी हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के की प्रेम कथा वाली बॉम्बे ने विवाद खड़ा किया था तो 2002 के गुजरात दंगों की कथा ‘परज़ानिया’ ने भी विवादों को खदबदाया था.

अगर फिल्मों के विवादित होने के कारणों पर गौर करें तो मुख्य रूप से रूढ़िवादी भारतीय समाज में अस्वीकार्य विषयों का उठाया जाना है. हालाँकि इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे विषय समाज में आ रहे बदलाव के कारण ही उठाये जाते हैं, लेकिन उनके संतुलित प्रस्तुतीकरण से विवादों को टाला जा सकता है.

इस सबके बावजूद यह बात सभी को समझनी चाहिए कि एक फ़िल्मकार अपनी रचना धर्मिता के तहत फिल्म बनाता है, जिसके कंटेंट को परखने का दायित्व सेंसर बोर्ड का है. अगर सेंसर बोर्ड फिल्म को पास कर देता है तो उसका विरोध जायज नहीं माना जा सकता. फिल्म को देखने या ना देखने का निर्णय आपका अपना हो सकता है. समाज की ठेकेदारी किसी कि बपौती नहीं है.

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