जनाधार तो है लालू के साथ भी

विगत कुछ दिनों से बिहार की राजनीति में जो कुछ सामने आ रहा है उसे बेहद निराशाजनक और स्वयं को शिखर पुरुष मान बैठे राजनीतिक खिलाड़ियों की नाकामी कहें तो कुछ गलत नहीं होगा। इसी परिदृष्य में लालू प्र यादव की राजनीति पर यदि नजर डालें तो इनका तौर तरीका ही कुछ और नजर आता है। पहली बार राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना कर इन्होंने चोंका दिया था तो दुबारा अपने बेटों को नीतीश मंत्रीमंडल में जगह दिला कर इन्होंने दिखा दिया कि भले ही और लोग कुछ और सोचते हों लेकिन लालू जो सोचते हैं आसानी से कर गुजरते हैं। बाकी सहमति-असहमति का खेल तो राजनीति में चलता ही रहता है। अतः राजनीतिक परिस्थितियों ने उनके बेटों को भी इस खेल से बाहर कर दिया और वे अपनी आपतियां दर्ज करते रह गये।

राजद की समस्या यह है कि जब राजद प्रमुख लालू प्र. यादव की अपनी ही समस्यायें खत्म होने का नाम नहीं ले रही और कई मामलों में उनकी सजायें बढ़ती-जुड़ती जा रही हैं तो यह किस-किस सवाल पर किस-किस से लड़े और इन परिस्थितियों में किस-किस से निपटे। लालू अपनी सजा के खिलाफ भले ही हाईकोर्ट जायें लेकिन उनकी छवि तो धूल-धूसरित हो ही गई है। माहौल कुछ ऐसा भी है कि पार्टी सुप्रीमो जैसी सूझ-बूझ का पार्टी में ही अभाव है और लालटेन को उसी तरह जलाये रखने में कभी -कभी लगता है कि उनके चिराग भी उतने सक्षम नहीं हैं।

लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लालू राजनीति में एक अनोखे प्रयोग के तौर पर जाने जाते हैं। भले ही चुनावी राजनीति ने इन्हें शामिल होने से वंचित कर रखा हो लेकिन इन सब दुर्गम रास्तों के बावजूद लालू का जनाधार एकदम खत्म हो गया हो, ऐसा भी नहीं दिखता। जब भाजपा कहीं रुकने ठहरने को तैयार नहीं था तो बिहार में लालू ने ही महागठबंधन का खेल खेला और खुद को साबित कर दिखाया। यह और बात है कि नीतीश सरकार में लालू के तेजस्वी बेटों ने ऐसे-ऐसे सवाल खड़े कर दिये कि नीतीश ने भाजपा के सहयोग से सरकार बनने का रास्ता देखकर इस खानदान से किनारा कर लिया।

लालू और उनके परिजनों के खिलाफ भ्रष्टाचार के ढेरों मामले भी उपज गये। ढेरों साबित भी होने लगे। अचानक उनके वारिसों की संपति बढ़ जाने से अन्य दलों की चिंतायें भी बढ़ने लगीं। हालांकि राजनीतिक चारिसों की संपति बढ़ने का यह पहला मामला नहीं था। फिर भी इन संकट की परिस्थितियों में ही चारा घोटालों के केस खुलने और उनमें लगाातार सजा तय होने ने, लालू को कहीं का नहीं छोड़ा।

शायद ये संकट जीवन भर लालू के साथ रहें लेकिन इस सब के बावजूद जबकि लालू सत्ता में नहीं हैं , भ्रष्टाचार के आरोप वाले वे अकेले नेता नहीं हैं, इनकी सजा भी लगातार तय हो रही हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इस सब के बावजूद यह मान लेना आसान नहीं होगा कि लालू का खेल खत्म हो गया है क्योंकि एक बड़ा जनाधार तो है लालू के साथ भी।

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